Faizan e Imam Bukhari

Book Name:Faizan e Imam Bukhari

की जाती हैं, इन में अक्सरिय्यत उन लोगों की होती है जो येह कहते नज़र आते हैं कि बस ह़ज के लिये चले जाओ ! जो कुछ लोग कर रहे होंगे वोही हम भी कर लेंगे । जब इ़बादात का येह ह़ाल है, तो दीगर फ़र्ज़ उ़लूम का ह़ाल क्या होगा ? यूंही ह़सद, बुग़्ज़, कीना, तकब्बुर, ग़ीबत, चुग़ली, बोह्तान और न जाने कितने ऐसे उमूर हैं जिन के बारे में जानना फ़र्ज़ है लेकिन एक ता'दाद को इन की ता'रीफे़ं बल्कि इन की फ़र्ज़िय्यत तक का इ़ल्म नहीं होता । येह वोह चीज़ें हैं जिन का गुनाह होना उ़मूमन लोगों को मा'लूम होता है और वोह चीज़ें जिन के बारे में बिल्कुल बे ख़बर हैं जैसे ख़रीदो फ़रोख़्त, मुलाज़मत, मस्जिद व मद्रसा और दीगर बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं जिन के बारे में लोगों को येह तक मा'लूम नहीं कि इन के कुछ मसाइल भी हैं, बस हर त़रफ़ एक अ़जीब सी कैफ़िय्यत है, ऐसी सूरत में हमें चाहिये कि ख़ुद भी इ़ल्मे दीन सीखें और जिन पर उस का बस चलता हो, उन्हें भी इ़ल्मे दीन सीखने की तरग़ीब दिलाए । अगर तमाम वालिदैन अपनी औलाद को, तमाम असातिज़ा अपने शागिर्दों को, तमाम पीर साह़िबान अपने मुरीदों को और तमाम अफ़्सरान व साह़िबे इक़्तिदार ह़ज़रात अपने मातह़्तों को इ़ल्मे दीन की त़रफ़ लगा दें, तो कुछ ही अ़र्से में हर त़रफ़ इ़ल्मे दीन का दौर दौरा हो जाएगा और लोगों के मुआ़मलात ख़ुद बख़ुद शरीअ़त के मुत़ाबिक़ होते जाएंगे । आज कल जो नाज़ुक सूरते ह़ाल है इस का अन्दाज़ा इस बात से लगाइये कि एक मरतबा सुनारों (ज्यूलर्ज़) की एक बड़ी ता'दाद को एक जगह जम्अ़ किया गया, जब उन से तफ़्सील के साथ उन का त़रीक़ए कार मा'लूम किया गया, तो वाज़ेह़ हुवा कि इस वक़्त सोने चांदी की तिजारत का जो त़रीक़ा राइज है, वोह तक़रीबन 80 फ़ीसद ख़िलाफे़ शरीअ़त है और ह़क़ीक़त येह है कि हमारी दीगर तिजारतें और मुलाज़मतें भी कुछ इसी क़िस्म की सूरते ह़ाल से दो चार हैं । जब मुआ़मला इतना नाज़ुक है, तो हर शख़्स अपनी ज़िम्मेदारी को मह़सूस कर सकता है, इस लिये हर शख़्स पर ज़रूरी है कि इ़ल्मे दीन सीखे और ह़त्तल इमकान दूसरों को सिखाए या इस राह पर लगाए । (सिरात़ुल जिनान, 6 / 290, मुलख़्ख़सन)

صَلُّوْا عَلَی الْحَبِیْب!      صَلَّی اللّٰہُ عَلٰی مُحَمَّد

12 मदनी कामों में से एक मदनी काम

"बा'दे फ़ज्र मदनी ह़ल्क़ा"

          ऐ आ़शिक़ाने रसूल ! आप ने सुना कि फ़र्ज़ उ़लूम सीखना किस क़दर ज़रूरी व अहम है, लिहाज़ा सुस्ती उड़ाइये, ख़्वाबे ग़फ़्लत से बेदार हो जाइये और फ़र्ज़ उ़लूम सीखने, सिखाने के लिये आ़शिक़ाने रसूल की मदनी तह़रीक दा'वते इस्लामी के मदनी माह़ोल से वाबस्ता हो जाइये और ज़ैली ह़ल्के़ के 12 मदनी कामों को अपना ओढ़ना बिछौना बना लीजिये । ज़ैली ह़ल्के़ के 12 मदनी कामों में से एक मदनी काम "बा'दे फ़ज्र मदनी ह़ल्क़ा" भी है जिस में नमाज़े फ़ज्र से फ़राग़त के बा'द मस्जिद में रोज़ाना 3 आयात की तिलावत मअ़ तर्जमए कन्ज़ुल ईमान और तफ़्सीरे ख़ज़ाइनुल इ़रफ़ान / तफ़्सीरे नूरुल इ़रफ़ान या तफ़्सीरे