Faizan e Imam Bukhari

Book Name:Faizan e Imam Bukhari

अह़ादीस दाख़िल की हैं और जिन ह़दीसों को मैं ने इस ख़याल से कि किताब बहुत लम्बी न हो जाए, छोड़ दिया, वोह इस से बहुत ज़ियादा हैं । (नुज़्हतुल क़ारी, स. 130)

          आप رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ ने दीगर भी कई किताबें (मसलन अत्तारीख़ुल कबीर, अत्तारीख़ुल औसत़, अत्तारीख़ुस्सग़ीर, किताबुज़्ज़ुअ़फ़ा, ख़ल्के़ अफ़्आ़लुल इ़बाद, अल मुस्नदुल कबीर, किताबुल अ़लल, अल अदबुल मुफ़रद वग़ैरा) लिखी हैं मगर सह़ीह़ बुख़ारी शरीफ़ ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ का वोह अ़ज़ीम कारनामा है जिस ने न सिर्फ़ अ़वाम व ख़वास में मक़्बूलिय्यत की मे'राज पाई बल्कि बारगाहे रिसालत से भी इसे मक़्बूलिय्यत का ए'ज़ाज़ अ़त़ा हुवा, यूं कि रसूले करीम صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ ने इसे अपनी त़रफ़ मन्सूब करते हुवे "मेरी किताब" फ़रमाया । चुनान्चे,

बारगाहे रिसालत में सह़ीह़ बुख़ारी शरीफ़ की मक़्बूलिय्यत

        ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम अबू ज़ैद मरवज़ी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : मैं एक मरतबा मक्के शरीफ़ में मक़ामे इब्राहीम और ह़जरे अस्वद के दरमियान सो रहा था कि मेरा नसीब जागा और ख़्वाब देखा कि नबिय्ये अकरम صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ फ़रमा रहे हैं : ऐ अबू ज़ैद ! किताबे शाफे़ई़ का दर्स कब तक दोगे ? हमारी किताब का दर्स क्यूं नहीं देते ? आप رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : मैं ने अ़र्ज़ की : या रसूलल्लाह صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ ! मेरी जान आप (صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ) पर क़ुरबान ! आप (صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ) की किताब कौन सी है ? मदनी आक़ा صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ ने इरशाद फ़रमाया : जामेए़ मुह़म्मद बिन इस्माई़ल या'नी इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ की किताब "बुख़ारी शरीफ़" । (बोस्तानुल मुह़द्दिसीन, स. 275, मुलख़्ख़सन)

          ऐ आ़शिक़ाने औलिया ! ग़ौर फ़रमाइये ! जिस किताब को रसूले पाक صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ पसन्द फ़रमाएं और उसे अपनी त़रफ़ मन्सूब फ़रमाएं, तो अन्दाज़ा लगाइये कि उसे पढ़ने, सुनने और उस का ख़त्म करने वालों को इस की कैसी कैसी बरकतें नसीब होंगी । आइये ! तरग़ीब के लिये ख़त्मे बुख़ारी की चन्द बरकतें मुलाह़ज़ा कीजिये । चुनान्चे,

ख़त्मे बुख़ारी के फ़वाइद

          (बा'ज़) आ़रिफ़ीन رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہِمْ اَجْمَعِیْن से मन्क़ूल है : अगर किसी मुश्किल में सह़ीह़ बुख़ारी को पढ़ा जाए, तो वोह मुश्किल ह़ल हो जाती है और जिस किश्ती (Boat) में सह़ीह़ बुख़ारी हो, वोह ग़र्क़ नहीं होती । ह़ाफ़िज़ इबने कसीर رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : ख़ुश्क साली में सह़ीह़ बुख़ारी पढ़ने से बारिश हो  जाती है । (तज़किरतुल मुह़द्दिसीन, स. 198) मश्हूर मुह़द्दिस, ह़ज़रते सय्यिदुना शैख़ अ़ब्दुल अ़ज़ीज़ मुह़द्दिसे देहलवी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : सख़्ती के वक़्त, दुश्मन के ख़ौफ़, मरज़ की सख़्ती और दीगर बलाओं में इस किताब का पढ़ना इ़लाज का काम देता है, अक्सर इस का तजरिबा हो चुका है । (बोस्तानुल मुह़द्दिसीन, स. 274, मुलख़्ख़सन)

        ह़कीमुल उम्मत, ह़ज़रते मुफ़्ती अह़मद यार ख़ान नई़मी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : बा'दे क़ुरआन शरीफ़ सह़ीह़ तर किताब "बुख़ारी शरीफ़" मानी गई है । मुसीबतों में ख़त्मे