Book Name:Faizan e Imam Bukhari
की धूमें मचाने लगे । मदनी माह़ोल से वाबस्तगी के कुछ ही अ़र्से बा'द शव्वालुल मुकर्रम में एक रात नमाज़े इ़शा पढ़ कर फ़ारिग़ हुवे, तो अचानक सीने में दर्द (Pain) मह़सूस हुवा जो बढ़ता ही चला गया, डॉक्टर्ज़ के पास ले जाया गया, दवा से कुछ फ़र्क़ न पड़ा मगर फिर अचानक बुलन्द आवाज़ से कलिमए त़य्यिबा का विर्द शुरूअ़ कर दिया, उन के साह़िबज़ादे ने इस त़रह़ अचानक कलिमए त़य्यिबा का विर्द करने की वज्ह पूछी । तो उन्हों ने फ़रमाया : बेटा ! सामने देखो ! मेरे पीरो मुर्शिद, अमीरे अहले सुन्नत دَامَتْ بَرْکَاتُھُمُ الْعَالِیَہ कलिमए त़य्यिबा पढ़ने की तल्क़ीन फ़रमा रहे हैं । येह कह कर दोबारा बुलन्द आवाज़ से कलिमए त़य्यिबा पढ़ना शुरूअ़ कर दिया और इसी त़रह़ कलिमए त़य्यिबा का विर्द करते करते उन का विसाल हो गया ।
صَلُّوْا عَلَی الْحَبِیْب! صَلَّی اللّٰہُ عَلٰی مُحَمَّد
ऐ आ़शिक़ाने रसूल ! बिला शुबा येह एक ह़क़ीक़त है कि जिस से इ़श्क़ हो जाता है, उस से निस्बत रखने वाली हर चीज़ से भी इ़श्क़ हो जाता है, मसलन मह़बूब के घर, उस के दरो दीवार, ह़त्ता कि मह़बूब के गली कूचों तक से अ़क़ीदत का तअ़ल्लुक़ (Relation) क़ाइम हो जाता है फिर भला जो इ़श्के़ नबी में गुम हो चुका हो, वोह आप صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ से निस्बत के सबब आप صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ واٰلِہٖ وَسَلَّمَ की अह़ादीसे मुबारका से मह़ब्बत क्यूं न रखेगा और क्यूं न उन का अदबो एह़तिराम करेगा !
اَلْحَمْدُ لِلّٰہ ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ का शुमार भी उन्ही बा कमाल हस्तियों में होता है जो अदब व ता'ज़ीम के पैकर और सच्चे आ़शिके़ रसूल थे । आप رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ ने अदब व ता'ज़ीम का दामन थाम कर इ़श्के़ मुस्त़फ़ा के गहरे समुन्दर में डूब कर लाखों अह़ादीसे करीमा में से "सह़ीह़ बुख़ारी" की सूरत में सह़ीह़ तरीन अह़ादीसे मुबारका का क़ीमती ख़ज़ाना जम्अ़ कर के उम्मते सरकार को अ़त़ा फ़रमाया । आइये ! इस मुबारक किताब की शानो अ़ज़मत सुनिये और झूमिये । चुनान्चे,
इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ का ह़दीस लिखने का अन्दाज़
ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : اَلْحَمْدُ لِلّٰہ मैं ने "सह़ीह़ बुख़ारी" में तक़रीबन छे हज़ार अह़ादीस ज़िक्र की हैं । हर ह़दीस को लिखने से पहले ग़ुस्ल करता, दो रक्अ़त नफ़्ल नमाज़ अदा करता और इस्तिख़ारा करता, जब किसी ह़दीस की सिह़्ह़त पर दिल जमता, तो उसे किताब में शामिल कर लेता । (ہدی الساری، مقدمۃ، ۱/ ۱۰, नुज़्हतुल क़ारी, स. 130)
एक और मक़ाम पर फ़रमाते हैं : मुझे छे लाख ह़दीसें याद हैं, जिन में से चुन चुन कर 16 साल में, मैं ने इस जामेअ़ (बुख़ारी) को लिखा है, मैं ने इसे अपने और अल्लाह पाक के दरमियान दलील बनाया है । (مقدمہ فتح الباری،ص۱۰) मैं ने अपनी इस किताब में सिर्फ़ सह़ीह़