Book Name:Faizan e Imam Bukhari
सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ के वसीले से दुआ़
अ़ल्लामा ताजुद्दीन सुब्की رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ के विसाले ज़ाहिरी के (200 साल) बा'द समरक़न्द में बारिशें न होने की वज्ह से लोग पानी की बूंद बूंद को तरस गए, लोगों ने कई बार नमाज़े इस्तिस्क़ा पढ़ी और दुआ़एं मांगीं लेकिन बारिश न हुई फिर एक नेक शख़्स जो दुन्या से बे रग़बती और तक़्वा व परहेज़गारी की वज्ह से मश्हूर था, शहर के क़ाज़ी के पास गया और उसे मशवरा दिया कि तुम शहर के लोगों को ले कर ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ की क़ब्र पर जाओ और वहां जा कर अल्लाह पाक से बारिश की दुआ़ मांगो, शायद अल्लाह पाक तुम्हारी दुआ़ क़बूल फ़रमा ले । क़ाज़ी ने येह मशवरा क़बूल कर लिया और लोगों के साथ ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ की क़ब्र पर आया, ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ के वसीले से दुआ़एं कीं और गिर्या व ज़ारी की, ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम बुख़ारी رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ से दुआ़ क़बूल होने के लिये सिफ़ारिश की, निहायत ही ख़ुशूअ़ व ख़ुज़ूअ़ से दुआ़ मांगी । उसी वक़्त आसमान पर बादल छा गए, सात रोज़ (Seven Days) तक मुसल्सल बारिश होती रही और इतनी बारिश हुई कि लोगों के लिये मक़ामे "ख़रतन्क" से "समरक़न्द" तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया (ख़रतन्क से समरक़न्द तक सिर्फ़ 3 मील का फ़ासिला है) । (طبقات الشافعیۃ الکبری،الطبقۃ الثانیۃ،۲ /۲۳۴)
صَلُّوْا عَلَی الْحَبِیْب! صَلَّی اللّٰہُ عَلٰی مُحَمَّد
ऐ आ़शिक़ाने औलिया ! اَلْحَمْدُ لِلّٰہ हमारे बुज़ुर्गाने दीन رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہِمْ اَجْمَعِیْن और अहले ह़क़ उ़लमाए किराम का येह मा'मूल रहा है कि वोह अपनी मुश्किलात के ह़ल के लिये औलियाए किराम رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہِمْ اَجْمَعِیْن के मज़ारात पर ह़ाज़िरी दिया करते और मन की मुरादें पाते थे । आइये ! बरकत ह़ासिल करने के लिये बुज़ुर्गों के मज़ारात पर जाने की बरकात के बारे में 2 रिवायात सुनिये । चुनान्चे,
ह़ज़रते सय्यिदुना ह़सन बिन इब्राहीम ख़ल्लाल ह़म्बली رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : मुझे जब कोई ह़ाजत पेश आती, तो मैं ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम मूसा बिन जा'फ़र رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ के मज़ारे पुर अन्वार पर ह़ाज़िर हो कर आप رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ का वसीला पेश करता हूं, अल्लाह करीम मेरी मुश्किल को आसान कर के मुझे मेरी मुराद अ़त़ा फ़रमा देता है । (تاریخ بغداد، مقدمۃ المصنف،باب ماذکر فی مقابر بغداد …الخ،۱/ ۱۳۳)
शाफे़इ़य्यों के अ़ज़ीम पेशवा, ह़ज़रते सय्यिदुना इमाम मुह़म्मद बिन इद्रीस शाफे़ई़ رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ फ़रमाते हैं : मुझे जब कोई ह़ाजत पेश आती है, तो मैं दो रक्अ़त नमाज़ अदा कर के ह़ज़रते सय्यिदुना इमामे आ'ज़म अबू ह़नीफ़ा رَحْمَۃُ اللّٰہ ِ عَلَیْہ के मज़ार शरीफ़ पर जा कर अल्लाह करीम से दुआ़ मांगता हूं, अल्लाह पाक मेरी ह़ाजत जल्द पूरी कर देता है । (الخیرات الحِسان، الفصل الخامس والثلاثون ،ص ۹۴ملتقطاً)
صَلُّوْا عَلَی الْحَبِیْب! صَلَّی اللّٰہُ عَلٰی مُحَمَّد