Book Name:Bazurgan-e-Deen Ka Jazba-e-Islah-e-Ummat
करने वाले बुज़ुर्ग फ़रमाते हैं : उन दोनों को रोता देख कर मैं भी रोने लगा, यहां तक कि वोह दोनों बेहोश हो कर गिर गए । ذم الھوی،الباب الخمسون فیہ وصایا …الخ، ص۴۳۷ ملخصاً))
मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! इस ह़िकायत में हमारे लिये नसीह़त के बहुत से मदनी फूल मौजूद हैं, मसलन मुबल्लिग़ को चाहिये कि जब उसे इनफ़िरादी या इजतिमाई़ सूरत में मुसलमानों की इस्लाह़ की कोशिश करने की सआ़दत नसीब हो, तो ख़ुद को मुत्तक़ी व परहेज़गार और इस्लाह़ से आज़ाद समझने के बजाए येह समझे कि दर ह़क़ीक़त येह नसीह़त मैं अपने आप को कर रहा हूं ।
اَلْحَمْدُ لِلّٰہ बुज़ुर्गाने दीन رَحْمَۃُ اللّٰہ ِتَعَالٰی عَلَیْہِمْ اَجْمَعِیْن के फै़ज़ान से माला माल आ़शिक़ाने रसूल की मदनी तह़रीक दा'वते इस्लामी इस्लाह़े उम्मत के लिये अपनी कोशिशें जारी रखे हुवे है । इस तह़रीक से वाबस्ता बा'ज़ मुबल्लिग़ीन इस अ़ज़ीम सुन्नत पर अ़मल करते हुवे आंसू बरसाती आंखों और आ़जिज़ी व इन्केसारी के साथ नेकी की दा'वत दे कर बिगड़े हुवे लोगों की इस्लाह़ की कोशिश का सामान करते हैं । यक़ीनन इन जैसे मुख़्लिस मुबल्लिग़ीन की इनफ़िरादी व इजतिमाई़ कोशिशों का ही तो सदक़ा है कि आज मुआ़शरे में सुन्नतों की मदनी बहारें आ़म हैं, कल तक जो कुफ़्र की तारीकियों में भटक रहे थे, बद अ़क़ीदा थे, वालिदैन के ना फ़रमान थे, फै़शन के शौक़ीन थे, गाने बाजों के दिल दादह थे, ह़राम ख़ोरी और इ़श्के़ मजाज़ी की आफ़त में गिरिफ़्तार थे, अल ग़रज़ ! त़रह़ त़रह़ के गुनाहों की दलदल में धंसे हुवे थे मगर जब इस्लाह़े उम्मत का दर्द रखने वाले मुख़्लिस मुबल्लिग़ीने दा'वते इस्लामी ने ख़ौफे़ ख़ुदा में डूब कर उन्हें फ़िक्रे आख़िरत पर मुश्तमिल नेकी की दा'वत पेश की, तो उन के दिल नर्म पड़ गए और वोह भी दा'वते इस्लामी से वाबस्ता हो कर सुन्नतों की धूमें मचाने वाले बन गए । लिहाज़ा हमें चाहिये कि हम भी इस अ़ज़ीम नेकी के लिये ख़ुद को ज़ेहनी त़ौर पर तय्यार करें ।
اَلْحَمْدُ لِلّٰہ मुसलमानों की इस्लाह़ की ख़ात़िर उन्हें नेकी की दा'वत देना वोह अ़ज़ीमुश्शान काम है कि रब्बे करीम ने अपने पाकीज़ा कलाम में इस अहम